हे पवनपुत्र प्रणहारी राम के सेवक आज्ञाकारी
वन वन में भटकते रघुनन्दन सतपुड़ा शिखर पर आते है
पितरों का तर्पण करने कों ताप्ती मैया में डुबकी लगाते है
वन वन में भटकते रघुनन्दन सतपुड़ा शिखर पर आते है
पितरों का तर्पण करने कों ताप्ती मैया में डुबकी लगाते है
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