मां ज्ञानेश्वरी आल्हा
(1)
श्री गणेश का सुमिरन करके ,करूँ शारदा मांँ का ध्यान।
मात सरस्वती वींणा वादिनी, मेरे कंठ विराजो आन।
महावीर अंजनी के लाला ,पहरे पर आओ हनुमान।
संत ज्ञानेश्वरी माता जी की ,लिखकर गाथा करूं बखान
भूल चूक जो भी हो जावे ,करियो श्रोता क्षमा प्रदान
लिख बेनाम बनाए आल्हा,, ....करे गुणगान
जब जब पाप बढ़े धरती पर ,तब तब प्रगट होय भगवान।
ऋषि मुनि जन करके तपस्या , भक्तों का करते कल्याण।
(2)
संत ज्ञानेश्वरी माता जी की, सुनिये गाथा ध्यान लगाए।
जिनकी तपस्या और भक्ति से ,भक्तों काम सफल हो जाय।
बगलामुखी माता की भक्ति ,शक्ति जिनपे गई समाय ।
अपनी चैतन्य ऊर्जा से माँ ,सबके दुखड़े देय मिटाय।
जग कल्याण हेतु माता जी ,बगलामुखी से ध्यान लगाय।
मंत्र ,तंत्र ,और यंत्र चिकित्सा ,से भक्तों के कष्ट हटाय।
बगलामुखी अनुष्ठान से मैया ,सबके काम सफल हो जाय।
संत श्री ज्ञानेश्वरी माता ,सत्य धर्म की राह दिखाय।
(3)
सबका हो आनंदमय जीवन ,मानसिक शारीरिक रोग विकार।
आर्थिक आदि हर प्रकार के ,दुख माताजी देती टार।
पीतांबरा बगलामुखी माँ की ,बोलो भक्तों जय कार।
संत श्री ज्ञानेश्वरी माता ,जन जन का करती उद्धार।
बड़ी दयालु सतगुणीं माता, करती सबसे प्यार दुलार।
महाकाल की करती सेवा, जो दु:ख दर्द करे संघार।
बगलामुखी और महाकाल की, जिन पर कृपा बरसती खास।
जो दुखिया फरियाद लगावे, आकर माताजी के पास।
(4)
ऐसी सतगुणीं माता जी के,भक्त बने चरणों के दास।
कौन पिता माता हैं इनकी ,बतलाती पढ़कर इतिहास।
कौन ग्राम में प्रगट भई हैं,सो नर सुंदर सुनते जाओ।
संत ज्ञानेश्वरी माता जी की , जीवन गाथा गुनते जाओ।
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में ,बैरीनाला है एक ग्राम।
संत उसी भूमि में प्रगटे ,जहां धर्म के होते काम।
गोस्वामी परिवार में जन्मी, शुक्ल पक्ष की भादों मास।
चौथ पंचमी पावन बेला, ब्रह्म तत्व से किया प्रकाश।
(5)
श्री सत्यनारायण गोस्वामी के ,घर मैया जी गई पधार।
इक्कीस सितंबर उन्नीस सौ अस्सी, शुभ दिन प्यारा था रविवार।
रुकमणी मैया के आंचल में ,कन्या रूप में लईं अवतार।
श्री महंत गोस्वामी जी के ,अंगना फूल गई फुलवार।
बैरीनाला ग्राम के भैया , जुड़ मिलकर के नर और नार।
पंडित जी के घर में देखो ,होये देखो मंगल चार।
श्री महंत जी सत्यनारायण ,बांट रहे सबको उपहार।
बड़ी खुशी है रुकमणी माता ,कर बेटी को लाड़ दुलार ।
(6)
एक दिन बोली रुकमणी माता , अपने पति को करके प्रणाम।
हे स्वामी अपनी बिटिया का ,सुंदर सा बतलाओ नाम।
सुन के प्रार्थना पंडित जी ने ,अपने खोले पोथी पुराण।
जन्म कुंडली रच दई देखो ,जो बिधना का रचा विधान।
ज्ञानेश्वरी है नाम धराया ,गुंण लक्षण सब दिये बताय।
खुशी हुई हैं रुकमणी माता , जिसकी प्रशंसा कहीं ना जाय।
पाँच बरस की भई ज्ञानेश्वरी , पढ़ने लिखने को तैयार।
नाम लिखा पहली कक्षा में , विद्यालय का पाने भंडार।
(7)
भीमगढ़ हाई स्कूल में पढ़कर ,ज्ञानेश्वरी ने पाया ज्ञान।
मैट्रिक तक की करके पढ़ाई , मात-पिता की राखी शान।
ज्ञानेश्वरी के माता-पिता ने ,पढ़-पढ़ करके वेद पुराण।
सत उपदेश दिए भक्तों को ,पाया खूब मान सम्मान।
डॉ.सत्यनारायण गोस्वामी ,श्री महंत जी बोले जाय।
धर्म,कर्म और ज्ञान ध्यान का ,भक्तों को है पाठ पढ़ाय।
बड़ी मर्मग्य है रुकमणी माता, जिनकी प्रशंसा कहीं ना जाय।
भगवत गीता और रामायण ,का भक्तों को सार बताय।
(8)
ज्ञानी ध्यानी सत्यनारायण ,का बतलाती पहले हाल।
अखंड ब्रह्म ध्यानालीन समाधि, लेने का कर लिया ख्याल।
सन् उन्नीसौ लगा अठत्तर , ग्राम बजरवाड़ा के धाम।
3 माह और 13 दिन तक ,लई समाधी धर विश्वास ।
दूर-दूर से नर और नारी ,जिनके दर्शन को गये आय।
श्री महंत की देख समाधी , एक दूजे से रहे बताय।
अखंड ब्रह्म ध्यानालीन समाधी , जैसी रखे शंकर भगवान।
दूजी समाधि और किसी की ,देखा सुना नहीं ना कान।
(9)
वही समाधी सत्यनारायण , गोस्वामी जी लीन्हें धार।
ग्राम बजरवाड़ा की भूमि , गूंजन लागी जय जय कार।
उनकी तपस्या भक्ति देखकर ,भक्तों को जागा विश्वास।
दूर-दूर से नर और नारी आवें श्री महंत के पास।
सबकी सुनकर दु:ख तकलीफें , बतला देते विधि विधान।
बीमारी की खोज लगाकर ,श्री महंत कर देते निदान।
एक दिन बोले रुकमणी जी से , सुनिये प्रिये लगाकर ध्यान।
अब मैं जाऊँ करने तपस्या , तुम सब रहना आनंद मान।
(10)
सत्यनारायण गिरी गोस्वामी ,गये हिमालय पर्वत और।
करी बिदाई रुकमणी जी ने ,होकर देखो भाव विभोर।
छ: महीने की थी ज्ञानेश्वरी ,पिता श्री का छूटा संग।
उसको मिल जाती है शक्ति ,भक्ति का चढ़ जाता रंग।
पालन पोषण करे रुकमणी ,संग में रहे पूरा परिवार।
पूजन भजन कीर्तन करके ,मिल जाता मनबोध आहार।
पाँच बरस की भई ज्ञानेश्वरी , खेलत कूदत कुछ होशियार।
अपनी माता रुक्मणी के संग ,जाये भागवत सुनने सार।
(11)
प्रवचन करतीं मात रुकमणीं ,बाँट रहीं भक्तों को ज्ञान।
दूर-दूर तक थी जजमानी ,बहुत शिष्य और थे जजमान।
जीवन की चलती है गाड़ी , सुना सुना कर वेद पुराण।
अपनी माँ के संग ज्ञानेश्वरी ,हरि की कथा सुने धर ध्यान।
भक्ति भाव के रंग में रंग कर ,सुर संगीत की छेड़े तान।
भजन सोरठा और चौपाई , ज्ञानेश्वरी लगी है गान।
ध्यान करे बम बम भोला का ,जो कर देते भाग्य विराट।
आठ साल की उम्र में कीन्हा , रामचरितमानस का पाठ।
(12)
सुंदरकांड भजन और कीर्तन , करने गाँव गाँव में जाय।
पढ़ने लिखने को विद्यालय ,पैदल चल चलकर के जाय।
बारहवीं कक्षा तक ज्ञानेश्वरी खूब पढ़ी है चित्त लगाय।
आगे ईश्वर की है मर्जी ,कौन तरफ किसको ले जाय।
आगे चलकर ज्ञान की दीक्षा ,लेने का है किया विचार।
काशी धर्म पीठाधीश्वर जी से ,ज्ञानेश्वरी ने करी गुहार।
दया करो दासी पर अपनी , जगत गुरु जी शंकराचार्य।
देकर दीक्षा मुझको भगवन ,सेवा मेरी करो स्वीकार।
(13)
गुरुवर ज्ञान दो ऐंसा स्वामी ,विद्या के भर दो भंडार।
सुनके प्रार्थना ज्ञानेश्वरी की ,बोले गुरुवर धीरज धार।
साधु संत जुड़े सन्यासी , तीर्थराज सम लगे प्रयाग।
हुई प्रसन्न सुनकर के आत्मा , बेटी तेरा रागिनी राग।
मांत सरस्वती स्वर की देवी ,सदा शारदा करे सहाय।
स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी ,सब के सन्मुख कहे सुनाया।
ज्ञान दीक्षा करूं तुम्हारी ,कृपा करें हरि शिव भगवान।
स्वामी नारायणानंद तीर्थ ने , ज्ञानेश्वरी के फूंके कान।
(14)
लगा वैशाख महीना प्यारे ,तृतीया शुक्ल पक्ष तिथि जान।
रही जयंती परशुराम की ,जिस दिन फूके गए थे कान।
मात-पिता से भक्ति शक्ति ,मिला गुरु से सच्चा ज्ञान।
पिता नारायण गिरी गोस्वामी ,कहने लगे सुनों धर ध्यान।
ब्रह्मास्त्र विद्या की दीक्षा ,मैं भी तुमको करूँ प्रदान।
हो प्रसन्न बगलामुखी माता , बेटी तेरा करे कल्याण।
ज्ञानेश्वरी की हुई है दीक्षा ,गुरु मंत्र का कर उपदेश।
शेष शारदा और सरस्वती , सुमिरे ब्रह्मा विष्णु महेश।
(15)
सतगुरु के जो चरण पकड़ ले , उसके कट जा कठिन कलेश।
लेके गुरु से ज्ञान गठरिया जाओ भ्रमण को देश-विदेश।
साधक बनकर करो साधनां ,नित्त नियम से नैन निहार।
छवि बसा लो जिसकी मन में ,सुनो प्रेम की डोरी डार।
भक्तों से भगवान हो बस में ,बाकी मिथ्या है संसार।
रम गई भोले की भक्ति में ,छोड़ जगत माया त्यौहार।
ज्ञानेश्वरी ने शिव शंभू की ,कठिन तपस्या लई है ठान।
शिव शक्ति की भक्ति देखो ,जीवन का कर दे कल्याण।
(16)
ब्रह्मास्त्र विद्या धन्य किया नित ,भजते शिव शंकर भगवान ।
माँ बगलामुखी बड़ी दयालू ,ममता मई ममता की खान।
ब्रम्हाअस्त्र माँ सांथ विराजे ,देवी ज्ञानेश्वरी के पास।
करी साधनां साधक बनकर ,सुख वैभव तज भूख और प्यास।
भई प्रसन्न बगलामुखी मैया ,दई दासी को आशीर्वाद।
धर्म कर्म करने के वास्ते , सत्य वचन करवा के याद।
देवी ज्ञानेश्वरी को मैया ,देकर तीन गई वरदान।
आयुर्वेद और ज्योतिष विद्या ,तीजा ब्रम्हाअस्त्र का ज्ञान।
(17)
करी किृपा जगदंब भवानी ,औघड़दानी भोलेनाथ।
देवी ज्ञानेश्वरी के सिर पे ,शिव शक्ति ने रखा हांथ।
दूर-दूर से आए भक्त जन ,जुड़ने लागी भीड़ अपार।
देवी ज्ञानेश्वरी माता की देखो ,गूंजन लागी जय जय कार।
उन्नीस सौ पंच्यानबे में ,जन-जन ने लीला है जान।
ब्रम्ह विद्या से देती सटीक फल ,करके पूरे विधि विधान।
कई भक्तों की मनोकामना , पूरण हो गये हैं सब काम।
माता ज्ञानेश्वरी देवी के ,सिद्ध पीठ आवे निज धाम।
(18)
दो हजार आठ में भक्तों ,मंदिर कीन्हा है निर्माण।
प्राण प्रतिष्ठा बगलामुखी की ,करवाई है विधि विधान।
महंत सतगुरु सत्यनारायण ,जिनके कर कमलों से खास।
प्राण प्रतिष्ठा करा माई की ,पूरण भई मन की अभिलाष।
तब से इस दरबार में भक्तों , दूर-दूर से आते लोग।
कोढ़ी की कंचन हो काया ,फुरती से मिट जावे रोग।
बाँझन गोदी लाल खिलावें ,निर्धन हो जावें धनवान।
देख कुंडली ग्रह और लक्षण ,समझ सूद कर विधि विधान।
(19)
जप,तप पूजन अनुष्ठान से ,दुख तकलीफें करती दूर।
सभी समस्या मिट जाती है , भक्ति शक्ति से भरपूर।
वर और वधु मिलान समस्या , सबका यहाँ पर होये निदान।
बना कुंडली लग्न महूरत , देवी कर देती कल्याण।
मनवांछित वर पाकर कन्या ,जीवन सदा रहे खुशहाल।
विनय करे ज्ञानेश्वरी देवी ,किृपा करें भोले महाकाल।
ज्ञान बांटती माँ ज्ञानेश्वरी ,भक्त करें जिसका रसपान।
जिनकी मृदु वाणीं को सुनकर , जीवन होता धन्य महान।
(20)
सतगुरु नाव बहे बैतरणीं ,पकड़ शिष्य लग जावे पार।
गुरु पद पंकज चरण बिंदु से , शिष्यों का होवे उद्धार।
ज्ञानेश्वरी माता ने अपने ,शिष्यों को देकर के ज्ञान।
गुरु शिष्य की परम्परा का ,सादर सुनो रखा है ध्यान।
बगलामुखी दरबार में जो भी ,आकर दुखिया दुःख सुनाये।
गुरुमाता की दिव्य दृष्टी से ,मन के सभी मनोरथ पाये।
देवी ज्ञानेश्वरी माता जी ,सब के कारज सफल बनाय।
बगलामुखी माँ शक्ति पीठ पर ,भक्ता दूर दूर से आय।
(21)
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में ,बना निराला है शुभ धाम।
शक्ति पीठ माँ बगलामुखी का , भैंरव संग में हैं विद्यमान।
माता ज्ञानेश्वरी देवी जी ,सबके करती पूरण काम।
पूजा,भक्ती वेद पाठ से ,हट जाते दुःख दर्द तमाम।
पूजन,बंदन विधि,विधान से ,लगीं बनाने को संजोग।
जिसकी आस्था होती सच्ची ,उसके मिट जाते हैं रोग।
लिख बेनाम बनाये आल्हा,,,......गाके रही सुनाय
रहत कठोदा और कटंगा ,शिव चरणों का ध्यान लगाय।