बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

मां बगलामुखी महिमा आल्हा

           मां ज्ञानेश्वरी आल्हा

(1)

श्री गणेश का सुमिरन करके ,करूँ शारदा मांँ का ध्यान।

मात सरस्वती वींणा वादिनी, मेरे कंठ विराजो आन।

महावीर अंजनी के लाला ,पहरे पर आओ हनुमान।

संत ज्ञानेश्‍वरी माता जी की ,लिखकर गाथा करूं बखान

भूल चूक जो भी हो जावे ,करियो श्रोता क्षमा प्रदान

लिख बेनाम बनाए आल्‍हा,,    ....करे  गुणगान

जब जब पाप बढ़े धरती पर ,तब तब प्रगट होय भगवान।

ऋषि मुनि जन करके तपस्या , भक्तों का करते कल्याण।

                                     (2)

संत ज्ञानेश्‍वरी माता जी की, सुनिये गाथा ध्यान लगाए।

जिनकी तपस्या और भक्ति से ,भक्तों काम सफल हो जाय।

बगलामुखी माता की भक्ति ,शक्ति जिनपे गई समाय ।

अपनी चैतन्य ऊर्जा से माँ ,सबके दुखड़े देय मिटाय।

जग कल्याण हेतु माता जी ,बगलामुखी से ध्यान लगाय।

मंत्र ,तंत्र ,और यंत्र चिकित्सा ,से भक्तों के कष्ट हटाय।

 बगलामुखी अनुष्ठान से मैया ,सबके काम सफल हो जाय।

संत श्री ज्ञानेश्‍वरी माता ,सत्य धर्म की राह दिखाय।

                                   (3)

सबका हो आनंदमय जीवन ,मानसिक शारीरिक रोग विकार।

आर्थिक आदि हर प्रकार के ,दुख माताजी देती टार।

पीतांबरा बगलामुखी माँ की ,बोलो भक्‍तों जय कार।

संत श्री ज्ञानेश्‍वरी माता ,जन जन का करती उद्‍धार।

बड़ी दयालु सतगुणीं माता, करती सबसे प्यार दुलार।

महाकाल की करती सेवा, जो दु:ख दर्द करे संघार।

बगलामुखी और महाकाल की, जिन पर कृपा बरसती खास।

जो दुखिया फरियाद लगावे, आकर माताजी के पास।

                                   (4)

ऐसी सतगुणीं माता जी के,भक्‍त बने चरणों के दास।

कौन पिता माता हैं इनकी ,बतलाती पढ़कर इतिहास।

कौन ग्राम में प्रगट भई हैं,सो नर सुंदर सुनते जाओ।

संत ज्ञानेश्‍वरी माता जी की , जीवन गाथा गुनते जाओ।

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में ,बैरीनाला है एक ग्राम।

संत उसी भूमि में प्रगटे ,जहां धर्म के होते काम।

गोस्वामी परिवार में जन्मी, शुक्ल पक्ष की भादों मास।

चौथ पंचमी पावन बेला, ब्रह्म तत्व से किया प्रकाश।

                                  (5)

श्री सत्यनारायण गोस्वामी के ,घर मैया जी गई पधार।

इक्‍कीस सितंबर उन्‍नीस सौ अस्‍सी, शुभ दिन प्यारा था रविवार।

रुकमणी मैया के आंचल में ,कन्या रूप में लईं अवतार।

श्री महंत गोस्वामी जी के ,अंगना फूल गई फुलवार।

बैरीनाला ग्राम के भैया , जुड़ मिलकर के नर और नार।

पंडित जी के घर में देखो ,होये देखो मंगल चार।

श्री महंत जी सत्यनारायण ,बांट रहे सबको उपहार।

बड़ी खुशी है रुकमणी माता ,कर बेटी को लाड़ दुलार ।

                                  (6)

एक दिन बोली रुकमणी माता , अपने पति को करके प्रणाम।

हे स्वामी अपनी बिटिया का ,सुंदर सा बतलाओ नाम।

सुन के प्रार्थना पंडित जी ने ,अपने खोले पोथी पुराण।

जन्म कुंडली रच दई देखो ,जो बिधना का रचा विधान।

ज्ञानेश्‍वरी है नाम धराया ,गुंण लक्षण सब दिये  बताय।

खुशी हुई हैं रुकमणी माता , जिसकी प्रशंसा कहीं ना जाय।

पाँच बरस की भई ज्ञानेश्‍वरी , पढ़ने लिखने को तैयार।

नाम लिखा पहली कक्षा में , विद्यालय का पाने भंडार।

                                  (7)

भीमगढ़ हाई स्कूल में पढ़कर ,ज्ञानेश्‍वरी ने पाया ज्ञान।

मैट्रिक तक की करके पढ़ाई , मात-पिता की राखी शान।

ज्ञानेश्‍वरी के माता-पिता ने ,पढ़-पढ़ करके वेद पुराण।

सत उपदेश दिए भक्तों को ,पाया खूब मान सम्मान।

डॉ.सत्यनारायण गोस्वामी ,श्री महंत जी बोले जाय।

धर्म,कर्म और ज्ञान ध्‍यान का ,भक्तों को है पाठ पढ़ाय।

बड़ी मर्मग्‍य है रुकमणी माता, जिनकी प्रशंसा कहीं ना जाय।

भगवत गीता और रामायण ,का भक्तों को सार बताय।

                                     (8)

ज्ञानी ध्यानी सत्यनारायण ,का बतलाती पहले हाल।

अखंड ब्रह्म ध्यानालीन समाधि, लेने का कर लिया ख्याल।

सन्‌ उन्‍नीसौ लगा अठत्‍तर , ग्राम बजरवाड़ा के धाम।

3 माह और 13 दिन तक ,लई समाधी धर विश्‍वास ।

दूर-दूर से नर और नारी ,जिनके दर्शन को गये आय।

श्री महंत की देख समाधी , एक दूजे से रहे बताय।

अखंड ब्रह्म ध्यानालीन समाधी , जैसी रखे शंकर भगवान।

दूजी समाधि और किसी की ,देखा सुना नहीं ना कान।

                                (9)

वही समाधी सत्यनारायण , गोस्वामी जी लीन्‍हें धार।

ग्राम बजरवाड़ा की भूमि , गूंजन लागी जय जय कार।

उनकी तपस्या भक्ति देखकर ,भक्तों को जागा विश्वास।

दूर-दूर से नर और नारी आवें श्री महंत के पास।

सबकी सुनकर दु:ख तकलीफें , बतला देते विधि विधान।

बीमारी की खोज लगाकर ,श्री महंत कर देते निदान।

एक दिन बोले रुकमणी जी से , सुनिये प्रिये लगाकर ध्यान।

अब मैं जाऊँ करने तपस्या , तुम सब रहना आनंद मान।

                                 (10)

सत्यनारायण गिरी गोस्वामी ,गये हिमालय पर्वत और।

करी बिदाई रुकमणी जी ने ,होकर देखो भाव विभोर।

छ: महीने की थी ज्ञानेश्‍वरी ,पिता श्री का छूटा संग।

उसको मिल जाती है शक्ति ,भक्ति का चढ़ जाता रंग।

पालन पोषण करे रुकमणी ,संग में रहे पूरा परिवार।

पूजन भजन कीर्तन करके ,मिल जाता मनबोध आहार।

पाँच बरस की भई ज्ञानेश्‍वरी , खेलत कूदत कुछ होशियार।

अपनी माता रुक्मणी के संग ,जाये भागवत सुनने सार।

                               (11)

प्रवचन करतीं मात रुकमणीं ,बाँट रहीं भक्तों को ज्ञान।

दूर-दूर तक थी जजमानी ,बहुत शिष्य और थे जजमान।

जीवन की चलती है गाड़ी , सुना सुना कर वेद पुराण।

अपनी माँ के संग ज्ञानेश्‍वरी ,हरि की कथा सुने धर ध्यान।

भक्ति भाव के रंग में रंग कर ,सुर संगीत की छेड़े तान।

भजन सोरठा और चौपाई , ज्ञानेश्‍वरी लगी है गान।

ध्यान करे बम बम भोला का ,जो कर देते भाग्य विराट।

आठ साल की उम्र में कीन्हा , रामचरितमानस का पाठ।

                              (12)

सुंदरकांड भजन और कीर्तन , करने गाँव गाँव में जाय।

पढ़ने लिखने को विद्यालय ,पैदल चल चलकर के जाय।

बारहवीं कक्षा तक ज्ञानेश्‍वरी खूब पढ़ी है चित्त लगाय।

आगे ईश्वर की है मर्जी ,कौन तरफ किसको ले जाय।

आगे चलकर ज्ञान की दीक्षा ,लेने का है किया विचार।

काशी धर्म पीठाधीश्वर जी से ,ज्ञानेश्‍वरी ने करी गुहार।

दया करो दासी पर अपनी , जगत गुरु जी शंकराचार्य।

देकर दीक्षा मुझको भगवन ,सेवा मेरी करो स्वीकार।

                              (13)

गुरुवर ज्ञान दो ऐंसा स्वामी ,विद्या के भर दो भंडार।

सुनके प्रार्थना ज्ञानेश्‍वरी की ,बोले गुरुवर धीरज धार।

साधु संत जुड़े सन्यासी , तीर्थराज सम लगे प्रयाग।

हुई प्रसन्न सुनकर के आत्मा , बेटी तेरा रागिनी राग।

मांत सरस्वती स्वर की देवी ,सदा शारदा करे सहाय।

स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी ,सब के सन्मुख कहे सुनाया।

ज्ञान दीक्षा करूं तुम्हारी ,कृपा करें हरि शिव भगवान।

स्वामी नारायणानंद तीर्थ ने , ज्ञानेश्‍वरी के फूंके कान।

                                  (14)

लगा वैशाख महीना प्यारे ,तृतीया शुक्ल पक्ष तिथि जान।

रही जयंती परशुराम की ,जिस दिन फूके गए थे कान।

मात-पिता से भक्ति शक्ति ,मिला गुरु से सच्चा ज्ञान।

पिता नारायण गिरी गोस्वामी ,कहने लगे सुनों धर ध्यान।

ब्रह्मास्त्र विद्या की दीक्षा ,मैं भी तुमको करूँ प्रदान।

हो प्रसन्न बगलामुखी माता , बेटी तेरा करे कल्याण।

ज्ञानेश्‍वरी की हुई है दीक्षा ,गुरु मंत्र का कर उपदेश।

शेष शारदा और सरस्वती , सुमिरे ब्रह्मा विष्णु महेश।

                            (15)

सतगुरु के जो चरण पकड़ ले , उसके कट जा कठिन कलेश।

लेके गुरु से ज्ञान गठरिया जाओ भ्रमण को देश-विदेश।

साधक बनकर करो साधनां ,नित्‍त नियम से नैन निहार।

छवि बसा लो जिसकी मन में ,सुनो प्रेम की डोरी डार।

भक्तों से भगवान हो बस में ,बाकी मिथ्या है संसार।

रम गई भोले की भक्ति में ,छोड़ जगत माया त्यौहार।

ज्ञानेश्‍वरी ने शिव शंभू की ,कठिन तपस्या लई है ठान।

शिव शक्ति की भक्ति देखो ,जीवन  का कर दे कल्याण।

                        (16)

ब्रह्मास्त्र विद्या धन्य किया नित ,भजते शिव शंकर भगवान ।

माँ बगलामुखी बड़ी दयालू ,ममता मई ममता की खान।

ब्रम्‍हाअस्‍त्र माँ सांथ विराजे ,देवी ज्ञानेश्‍वरी के पास।

करी साधनां साधक बनकर ,सुख वैभव तज भूख और प्‍यास।

भई प्रसन्न बगलामुखी मैया ,दई दासी को आशीर्वाद।

धर्म कर्म करने के वास्ते , सत्य वचन करवा के याद।

देवी ज्ञानेश्‍वरी को मैया ,देकर तीन गई वरदान।

आयुर्वेद और ज्योतिष विद्या ,तीजा ब्रम्‍हाअस्त्र का ज्ञान।

                           (17)

करी किृपा जगदंब भवानी ,औघड़दानी भोलेनाथ।

देवी ज्ञानेश्‍वरी के सिर पे ,शिव शक्ति ने रखा हांथ।

दूर-दूर से आए भक्त जन ,जुड़ने लागी भीड़ अपार।

देवी ज्ञानेश्‍वरी माता की देखो ,गूंजन लागी जय जय कार।

उन्‍नीस सौ पंच्‍यानबे में ,जन-जन ने लीला है जान।

ब्रम्‍ह विद्या से देती सटीक फल ,करके पूरे विधि विधान।

कई भक्तों की मनोकामना , पूरण हो गये हैं सब काम।

माता ज्ञानेश्‍वरी देवी के ,सिद्ध पीठ आवे निज धाम।

                         (18)


दो हजार आठ में भक्तों ,मंदिर कीन्‍हा है निर्माण।

प्राण प्रतिष्ठा बगलामुखी की ,करवाई है विधि विधान।

महंत सतगुरु सत्यनारायण ,जिनके कर कमलों से खास।

प्राण प्रतिष्ठा करा माई की ,पूरण भई मन की अभिलाष।

तब से इस दरबार में भक्तों , दूर-दूर से आते लोग।

कोढ़ी की कंचन हो काया ,फुरती से मिट जावे रोग।

बाँझन गोदी लाल खिलावें ,निर्धन हो जावें धनवान।

देख कुंडली ग्रह और लक्षण ,समझ सूद कर विधि विधान।

                           (19)

जप,तप पूजन अनुष्ठान से ,दुख तकलीफें करती दूर।

सभी समस्या मिट जाती है , भक्ति शक्ति से भरपूर।

वर और वधु मिलान समस्या , सबका यहाँ पर होये निदान।

बना कुंडली लग्न महूरत , देवी कर देती कल्याण।

मनवांछित वर पाकर कन्या ,जीवन सदा रहे खुशहाल।

विनय करे ज्ञानेश्‍वरी देवी ,किृपा करें भोले महाकाल।

ज्ञान बांटती माँ ज्ञानेश्‍वरी ,भक्त करें जिसका रसपान।

जिनकी मृदु वाणीं को सुनकर , जीवन होता धन्य महान।

                          (20)

सतगुरु नाव बहे बैतरणीं ,पकड़ शिष्‍य लग जावे पार।

गुरु पद पंकज चरण बिंदु से , शिष्यों का होवे उद्धार।

ज्ञानेश्‍वरी माता ने अपने ,शिष्‍यों को देकर के ज्ञान।

गुरु शिष्य की परम्‍परा का ,सादर सुनो रखा है ध्यान।

बगलामुखी दरबार में जो भी ,आकर दुखिया दुःख सुनाये।

गुरुमाता की दिव्य दृष्टी से ,मन के सभी मनोरथ पाये।

देवी ज्ञानेश्‍वरी माता जी ,सब के कारज सफल बनाय।

बगलामुखी माँ शक्ति पीठ पर ,भक्‍ता दूर दूर से आय।

                          (21)

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में ,बना निराला है शुभ धाम।

शक्ति पीठ माँ बगलामुखी का , भैंरव संग में हैं विद्यमान।

माता ज्ञानेश्‍वरी देवी जी ,सबके करती पूरण काम।

पूजा,भक्ती वेद पाठ से ,हट जाते दुःख दर्द तमाम।

पूजन,बंदन विधि,विधान से ,लगीं बनाने को संजोग।

जिसकी आस्‍था होती सच्‍ची ,उसके मिट जाते हैं रोग।

लिख बेनाम बनाये आल्हा,,,......गाके रही सुनाय

रहत कठोदा और कटंगा ,शिव चरणों का ध्यान लगाय।


शनिवार, 11 जुलाई 2020

सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ

🌺🌺🙏🙏🙏*।। देवी जस ।।*🙏🙏🙏🌺🌺

सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ - k
 तेरी जय जयकार भवानी, तेरी जय जयकार माँ - k
सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ - k
जगदम्बा मैय्या घट घट बसो रे ... 
घट घट बसो रे मैय्या पूजे सकल संसार रे ...
जगदम्बा मैया हो..
======= मुखड़ा ========

विंध्यवासिनी जब हुई राज़ी ।।
मेहंदी गाँव में आन बिराजी ।।
हारी जीत गये सब बाज़ी ... तेरी जय जयकार माँ 
2k_सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ

विन्ध्याचल में है ज्योती तुम्हारी ...
ज्योती तुम्हारी मेहंदी गाँव हुआ उजियार रे ...
 विंध्याचल मैया हो...
===== पहला अंतरा ======

चोला बदल बदलकर आये ।।
बाल युवा वृद्धा बन जाये ।।
आँखों वाला चक्कर खाये ... तेरी जय जयकार माँ ...
2k_सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ

कोराड़ी वाली अम्बा जगदम्बा ...
अम्बा जगदम्बा मैय्या करती अजब सिंगारे रे ...
जगदम्बा मैया हो....
===== दूसरा अंतरा ======

चार दिवारी से है घेरा ।।
बीच किले में डाली डेरा ।।
अटल भवानी राज है तेरा ... तेरी जय जयकार माँ ...
2k_सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ

नगरधन में है आसन तुम्हारो ...
आसन तुम्हारो मैय्या धारे जगत का भार रे ...
भवानी मैया हो.....
====== तीसरा अंतरा =====

तेजराम पर दया करी माँ ।।
पाया शिवगौरी की प्रतिमा ।।
गढ़ पर्वत पर गूँजी महिमा ... तेरी जय जयकार माँ  ...
2k_सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जय कार माँ

पटगोवारी है माँ की  नगरिया...
माँ की नगरिया गौरा शिव संग करत संसार रे ...
शिवगौरी मैया हो...
====== चौथा अंतरा ======

जो ये चार धाम हो आये ।।
निश्चित चारों फल पा जाये ।।
दुर्गाप्रसाद सदा गुण गाये ... तेरी जय जयकार माँ ..
2k_सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ 

अशरण को तुम्हीं देतीं शरण माँ ...
 देतीं शरण माँ मैं भी आया हूँ तेरे दरबार रे ...
विन्ध्याचल मैया हो.....
सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ - k
सात द्वीप नौ खण्ड मे हो रही ... तेरी जय जयकार माँ 3k
===== पाँचवाँ अंतरा =====

लेखक : संदीप करोसिया
           *श्यामसरोज*
निर्माता, निर्देशक :दुर्गाप्रसाद धनोले
            📲-7709506291

भक्तों को तारन बैठीं माँ,नीम की थंडी छाव

रुणुक झुणूक माँ विंध्यवासिनी, आगई मेहँदी गावं
भक्तों को तारन बैठीं माँ,नीम की थंडी छाव - 2

विन्ध्याचल की विंध्यवासिनी, मेहँदी गावं की शान हो
भक्तों को दर्शन देकर माँ, करती जग कल्याण हो
पर्वतराज का मान बढ़ाकर - 2 आई मेहँदी गावं
भक्तों को तारण बैठी माँ, नीम की थंडी छाव - 2

हुआ अवतार योग मात का, विंध्य गिरी मे छाई
पूजित हुई संसार में माता, अष्‍टभुजा कहलाई
एक दिवाने भक्त की खातिर - 2 पहुची मेहँदी गावं
भक्तों को तारण बैठी माँ, नीम की थंडी छाव-2

पावन हो गई गाव की धरती, जबसे चरण पडे माँ
दुर्गा दुर्गती दूर करो माँ, दुर्गा दास कहे माँ
कर स्विकार माँ आरती - 2 और दे आचल की छाव
भक्तों को तारण बैठीं माँ, नीम की थंडी छाव-2

रुणुक झुणूक माँ विंध्यवासिनी, आगई मेहँदी गावं
भक्तों को तारन बैठीं माँ,नीम की थंडी छाव - 2

गीतकार : रवि शंकर सोनी
निर्देशक  :दुर्गाप्रसाद धनोले 📲-7709506291
विशेष सहयोग - धर्म प्रचार प्रसार मंच 

विंध्यवासिनी मन्दिर मेहन्दी गाथा - भजन गायिका चांदनी शर्मा

मेहँदी गाव मे सजा है दरबार, भगत आये दूर दूर से-2
हो बैठी विंध्यवासिनी मैया आसन मार, भगत आये दूर दूर से

1_पेंच नदी किनारे बसा ये, मेहंदी गाव निराला
भक्तों को मन मोहक लगे, मैया तेरा दिवाला
झंडा लहर लहर लहराया , किसने मंदिर तेरा बनाया
हो किया हम भक्तों पे बड़ा उपकार, भगत आये दूर दूर से....

2_ग्रामवासियों ने मिलकर के, मंदिर भव्य बनाया
शाकम्भरी नवरात्री शुभ दिन, तोरण द्वार सजाया
माँ का करके अर्चन वंदन, शिव के प्राथ्रीक लिंग का पूजन
हो सतचंडी यज्ञ किया है अपार, भगत आये दूर दूर से......

3_शोभा यात्रा निकली माँ की, भक्तन भीड़ है भारी
घट स्थापन कर भक्तों ने, बोले जय जय कारी
पूजे सात दीप नौ खंड, ज्योति प्रज्वलित माँ की अखंड
हो किया मैया जी का भक्तों ने शृंगार, भगत आये दूर दूर से...

4_दूज तीज और चौथ पंचमी, भक्तन ने जल ढारे
छटे सप्तमी तिथि अष्टमी,  माँ के निकले जवारे
हवन पूजन कर आरती वंदन, सबको तिलक लगाके चंदन
हो कन्या भोजन का लगाया भंडार, भगत आये दूर दूर से...

5_नवमी तिथि विसर्जन बेला, माँ के निकले जवारे
कासी टेकडी पेंच नदी के, पोहचे घाट किनारे
माँ का लेकर आशीर्वाद, भक्तों पाओ महाप्रसाद
हो कल कल कर ती जाये पेंच नदी की धार, भगत आये दूर दूर से...

6_शाकम्भरी नवरात्री तबसे, भक्त यहा है मनाते
विंध्यवासिनी माँ के दर से, मनकी मनोती पाते
करलो भजन कीर्तन गान, जीवन का करने कल्याण
हो बाजे ढोल नगाड़े मैया जी के द्वार, भगत आये दूर दूर से

7_मेहंदी गाव की गाथा लिखकर, मन मेरा हरसाया
दुर्गाप्रसाद धनोले जी ने, सारा हाल सुनाया
विनती करता है बेनाम, बुलवा ले माँ अपने धाम
हों मनकी मनसा माँ करले स्विकार,भगत आये दूर दूर से


गुरुवार, 9 जुलाई 2020

माँ विंध्यवासिनी का दर मिल गया है - भजन गायक रवि सोनी

मुझे मेरे मुस्किल का - 2, हल मिल गया है ! 
माँ विंध्यवासिनी का दर मिल गया है !

मिटणे लगी है चिंता मन की. ढाल बनी माँ घर आंगण की !
भक्तों को भक्ति का - 2, फल मिल गया है !

कोण है खुश किस आँख मे पानी, माँ तो जाने सबकी कहानी!
मैया के चरणों का - 2, घर मिल गया है!

माँ को पास मे ले आयेंगी, प्रार्थना खाली ना जाएंगी ! 
भक्ती के गीत को - 2, असर मिल गया है! 

दुःख मे साथी चंद मिलते है , हर दरवाज़े बंद मिलते है!
हरपल खुला माँ का - 2, दर मिल गया है!

मुस्किल कुछ नहीं तेरे लिये माँ, तू ही सब कुछ मेरे लिये! 
जिंदगी के नाव को - 2, सफर मिल गया है! 

दुर्गाप्रसाद को देता सहारा, स्वर्ग से साचा द्वार तुम्हारा ! 
जयंत को आने वाला - 2, कल मिल गया है!

सोमवार, 27 जनवरी 2020

माँ रेणुका देवी अमृतवाणी

भक्तों तुमने तो अनेक पावन कथा होगी । भोले भंडारी की,  कलकत्ते वाली की,  राधे श्याम की,  सिया राम की । पर जो आज पावन कथा मै तुमको सुनाने जा रहा हूँ वह सबसे भिन्न है, अनुपम है। मां दुर्गा की  अवतारी, मां रेणुका के, अवतरण की कथा बड़ी मनोरम है। तो आओं प्रिय भक्तों मां रेणुका का गुणगान करे।सच्चे मन से उनका ध्यान धरे।

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नमो नमः ×4, 
नमो नमः मां रेणुका × 4
जमदारा की तू महारानी,  मां रेणुका कृपा करो 
पावन तेरी अमृतवाणी,  सबके मां संकट हरो
नमो नमः  ×4
नमो नमः मां रेणुका  × 4

1-------------

जगदंबा की तू अवतारी,  तेरी महिमा न्यारी है 
आदि शक्ति सिद्ध स्वरूपा,  पूजे सृष्टि सारी है
सूरज में मां तेज तुम्हारा,  चंद्र में शीतल छाया है 
कण-कण में मां तेरा जलवा, तेरा रूप ही पाया है 
वृक्ष लता सब पौधे मां,  तुझसे फ़ले फूले है
धरती अम्बर और तारे, तुम बिन मां अधूरे है 
जगमग तेरी जोत नूरानी,  मां रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी,  मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः ×4
नमो नमः मां रेणुका × 4
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मां रेणुका का पूर्व जन्म में अदिति था। अदिति शिव जी की उपासक थी । उन्होंने कई वर्षों तक शिव जी की आराधना तपस्या की। अदिति के जप-तप से प्रसन्न होकर शिव जी उन्हें कई वरदान दिए।

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2---------------

पूर्व जनम मे रेणुका ने, नाम अदिति पाया था।
कईं वर्षों तक कर तपस्या शिव भोले को मनाया था ।
राई को पर्वत कर देती,  तू मां बड़ी निराली है।
गागर में सागर भर देती,  तेरी कीर्ति न्यारी है ।
अपनी ममता का खजाना,  भक्तों पे लुटाती हो ।
जो भी तुझको शीश झुकाता, उसकी बिगड़ी बनाती हो ।
सब पर है तेरी मेहरबानी,  मां रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी,  मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः  ×4
नमो नमः मां रेणुका  × 4

माँ रेणुका ने पूर्व जन्म  अदिति रूप में कई वरदान प्राप्त किए। पहला वरदान उनको यह मिला कि प्रभु हरि का छठवां अवतार तुम्हारी कोख से जन्म होगा ।
जग मे तुम्हारी अत्यधिक  मान- प्रतिष्ठा  होगी।  तुम्हे इकवीरा के नाम से भी जाना जाएगा ।

3------------

शिव से वर माँ तुमने पाया , जग में मान पाओगी 
प्रभू हरी ले कोख से जन्म , इकवीरा कहलाओगी 
दुखियों के तू कष्ट निवारे , तू माँ सुखदाई है 
भवसिंधु से पार उतारे , सबकी तू सहाई है 
जीवन में हो जितनी उलझन , उसको तुम सुलझाती हो 
जो माँ तेरा ध्यान धरे , संकट से उसे बचाती हो 
तेरी शक्ति सबने मानी , मां रेणुका कृपा करो
जमदारा की तू महारानी,  मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः  ×4
नमो नमः मां रेणुका  ×4
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मां रेणुका का जन्म इक्ष्वाकु वंशीय राजा रेणु के महल में हुआ । राजा रेणु की दो पुत्रीया थी ,  रेणुका और बेणुका। दोनो पुत्री रूपमती थी। राजा को अपनी धन दौलत का अहंकार था। एक दिन राजा ने अपनी पुत्रियों से प्रश्न किया कि तुम किसका दिया खाती हो। बेणुका के उत्तर से राजा रेणु अत्यधिक प्रसन्न हुए क्योंकि बेणुका ने कहा पिताजी मैं आपका दिया खाती हूँ । पर रेणुका का उत्तर सुनकर अत्यधिक क्रोधित हुए क्योंकि रेणुका ने कहा पिताजी मैं परमात्मा का दिया हुआ अपने नसीब का खाती हूँ ।प्रतिकार स्वरूप राजा ने बेणुका का विवाह पराक्रमी राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन से किया और रेणुका का विवाह निर्धन तपस्वी भृगुवंशीय मुनि जमदग्नि से किया ।

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राजा रेणु की तू पुत्री,  जमदग्नि तेरे स्वामी है 
घट घट में मां तू समाई, तू मां अन्तर्यामी है
तू चाहे तो बंजर मे, हरियाली लहराती है 
सूखे सरवर मे भी मां,  तू ही फूल खिलाती है
पत्थर को पारस कर देती,  तेरी शक्ति अपार है
जो मां तेरी माला जपता, उसका मां उद्धार है
जग कहता तुमको कल्याणी,  मां रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः ×4
नमो नमः मां रेणुका  ×4

अदिति को शिव जी से  दूसरा वरदान यह मिला कि कलयुग में तुम्हे महादेवी के रूप मे पहचाना जाएगा ।
कुल देवी के रूप मे तुम्हारी पूजा की जाएगी । तुम्हे कुल स्वामी भी कहा जाएगा ।तुम्हारी आराधना करने से विधवा भी सुहागन हो जाएगी। तुम सदा नारी की लाज बजाओगी। तुम सबकी मनोकामना पूर्ण करोगी।

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कलयुग में देवी की देवी , मैया तुम कहाती हो 
कुलदेवी के रूप में माँ , तुम तो पूजी जाती हो 
सतियों के तु सत संवारे , सबकी लाज बचाती  है 
विधवा को तु मंगली करती ,आस का दीप जगाती है
मंगल करती सारे काज , अमंगल तुम हरती हो 
जो माँ करता तेरा पाठ , कामना पूरी करती हो 
जग में ना तुमसा वरदानी,मां रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी,  मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः ×4
नमो नमः मां रेणुका  × 4

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मां रेणुका को पांच पुत्रो की प्राप्ति हुई । शिव जी के वरदान अनुसार पांचवे पुत्र परशुराम जो प्रभु हरि के छठवे अवतार के रूप मे जाने जाते है। उनका जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन हुआ था। जिस तिथि को अक्षय तृतीया के नाम से भी जाना जाता है ।परशुराम तेजस्वी  पराक्रमी थे।

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परशुराम की तू है माता , सबकी तू हितकारी है
लाचारो को देती सहारा , भक्तों को रखवाली है 
सुखे नीरज जीवन में माँ , तुम ही बहार लाती हो
गम के बादल दूर भगाती , खुशियाँ तुम बरसाती हो
करुणा की माँ निर्मल धारा , तेरे चरणो बहती है 
करता जो माँ तेरा चिंतन , उसे न चिंता रहती है
तुमको सेवत ब्रम्हाज्ञानी  ..माँ रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः  ×4
नमो नमः मां रेणुका  × 4

मां रेणुका को अन्नपूर्णा देवी भी कहा जाता है । अन्नपूर्णा माता का हृदय सागर से भी विशाल है । अन्नपूर्णा माता की कृपा से सबके भंडार भरे रहते हैं । माता की दया दृष्टि जिस पर हो वो कभी भूखा नही सो सकता । माता पल भर मे ही निर्धन को धनवान बना देती है । अन्नपूर्णा मां के चरणो मे मेरा कोटि कोटि प्रणाम ।

(बोलो रेणुका माता की जय)

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अन्नपूर्णा रूप तुम्हारा , जग का पालन करती हो
अन्न धन के सबके माता , तुम भण्डार भरती हो
भुक्षुक को सम्राट बना दे , तेरी अजब ये माया है
निर्बल को दे अपना बल , प्रेम सुधा बरसाया है 
तेरा जो अर्चन करता, वो सुख समृद्धि पाता है 
आनन्द वैभव देने वाली , कर्ज से मुक्त हो जाता है 
तु हि माँ सम्पति की दानी , माँ रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः  × 4
नमो नमः मां रेणुका  × 4

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रेणुका झील की गाथा बड़ी पावन है। प्रबोधिनी एकादशी की पूर्व संध्या पर यहाँ मेला भराता है। कहां जाता  हैं कि भगवान परशुराम अपनी मां रेणुका से आशीर्वाद लेने यहाँ आते हैं। माता और पुत्र को समर्पित यह मेला पूरे विश्व में अनूठा कहा जाता है। यहां रेणुका झील के किनारे भगवान परशुराम एवं मां रेणुका का मंदिर भी स्थित है। 


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हिमाचल में झील रेणुका, जिसकी पावन गाथा है 
दोष रोग से मुक्त हो जाता, जो भी डुबकी लगाता है
तेरे माता इशारे से , कंकर मोती बनते है 
रेगिस्तान में भी माँ , उपवन ख़ूब महकते है 
सुख का होता नया सवेरा , दुःख की शाम ढलती है 
श्रध्दा सुमन जो अर्पण करता , उसकी झोली भरती  है
देरी गाथा वेद बखानी , माँ रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः  × 4
नमो नमः मां रेणुका  ×4

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मां रेणुका के देश भर मे कई शक्ति पीठ है। मां का रूप अति सुन्दर है। मां रेणुका के दर्शन मात्र से ही मन प्रफुल्लित हो जाता है,  सुख शांति का आभास होता है ,जीवन संवर जाता है । तीनों लोक मे माता का गुणगान होता है। मां की पावन जोत से तीनो लोको मे उजाला फैला हुआ है। जो भक्त माता का पूजन अर्चन करता है। वो भव सागर से तर जाता है ।

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चन्द्र सा तेरा रूप चमके,  मुख माँ बड़ा विशाल है 
नयन है तेरे मोटे लाल , बोंहें माँ विकराल है 
तेरा दर्शन जो भी करता, भव से वो तर जाता है 
लाख चौरासी योनियों से , वो माँ मोक्ष पाता है 
विकट डगर में माँ रेणुका , जिसने तुम्हे पुकारा  है
जीवन के पग पग में माँ ,  तूने उसे संभाला है
सिमरन करते सारे प्राणी, माँ रेणुका कृपा करो
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः  × 4
नमो नमः मां रेणुका  × 4 

परशुराम ने विवश होकर अपने पिता की आज्ञा का पालन किया ।उन्होंने अपनी माँ रेणुका का शीश धड़ से अलग कर दिया । परशुराम के पिता जमदग्नि मुनिवर पुत्र की आज्ञा के पालन अति प्रसन्न हुए । जमदग्नि मुनिवर ने फ  स्वरूप उनको वरदान मांगने को कहा  तो परशुराम वरदान स्वरूप कुछ भी मांग सकते थे। पर माँ तो माँ होती है और माँ का स्थान इस जग मे कोई दूजा नही पा सकता। इसलिए परशुराम ने वरदान मे अपनी माँ रेणुका का पुनर्जीवन मांगा। जमदग्नि मुनिवर ने परशुराम की इच्छा पूर्ण की और माँ रेणुका को पुनर्जीवन दिया । जमदारा की दैविक भूमि पर यह घटना घटित हुई । माँ रेणुका के बहते रक्त ने पाषण का रूप धर लिया । और आज यहाँ  माँ रेणुका की भव्य मंदिर सजा हुआ है। दूर-दूर से भक्त श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए आते हैं । और इच्छा फल प्राप्त करते हैं 


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होकर परशुराम विवश, अपना वचन निभाते हैं 
अपनी माँ का शीश धड़ से , खुद ही अलग कर जाते है
माता के बहते रक्त ने,  वहां पत्थर रूप धारा है 
धन्य हो गई वो धरती,  जहाँ मां का मंदिर प्यारा है 
माटी को चंदन कर देती,  लोहा कंचन करती हैं 
करता जो  ही मां का किरतन, किस्मत उसकी बदलती है 
तेरी लीला सबने जानी, मां रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः ×4
नमो नमः मां रेणुका ×4

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मां रेणुका का हृदय कोमल है। वह अपने भक्तों पर, बच्चों पर अपार ममता लुटाती है। जो इनकी शरण मे आ जाता है उसे हर संकट से बचाती है। हे प्राणी मोहमाया से छूटकर मां की लगन लगाले। अपने जीवन की डोर मां को सौंप दे।  तेरे जीवन कश्ती की पतवार है मां । वो तुझे कभी बींच भंवर मे न डोलने देगी। अपना संपूर्ण जीवन मां की सेवा मे लगाले।

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इधर उधर क्यूँ भटकें प्राणी,  मां की शरण में आजा रे
टूट जाए सांसो की माला  , कब किसने यह जाना रे
कांटो को मां कलियाँ करती, विष को अमृत करती है 
अज्ञान अंधेरा मिट जाता  , ज्ञान की जोती जगती है 
जिसके सिर हो मां का साया, वो न कभी घबराता है 
मन दर्पण निर्मल हो जाता,  पाप से मुक्ति पाता है
देवो ने गाई अमृतवाणी,  मां रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः ×4
नमो नमः मां रेणुका ×4

12 धामनगांव, मोहटा मे, मां का मंदिर प्यारा है 
सौदंति मे मां यल्लमा, काली रूप धारा है   
खंडवा बुरहानपुर  मे, मां की मूरत प्यारी है 
माहूरगढ़ मे ये जगदंबा, सबकी तारनहारी है 
छावल उत्तरकाशी, जो भी भक्त जाते है 
दर्शन करके माता को, मन चाहा वर पाते है
औरंगाबाद पातुर मे,मां की शान निराली है 
पठानकोट और चिखली मे, मां से होली दिवाली है
डोंगर में ये है इकवीरा, सबकी विपदा हरती है 
जलालाबाद  बिसनूर मे, मां सुख की बरखा करती है 
जानापांव चांदबड़  मे, जो जयकारे गाते है
भक्तों के सब दुर्गम काज, पल मे सुगम हो जाते है  
सारी दुनिया मां की दिवानी, मां रेणुका कृपा करो 
जमदारा की तू महारानी, मां रेणुका कृपा करो 
नमो नमः  × 4
नमो नमः मां रेणुका  ×4

गीतकार - कीर्ति पाहूजा 
स्थान - माँ रेणुका मन्दिर जमदारा भिण्ड मप्र .
सहयोग - शिवेन्द्र सिंग गुर्जर
संकलनकर्ता - रविन्द्र मानकर

हैं मां रेणुका परशुराम की दर्द भरी कहानी



हैं मां रेणुका परशुराम की दर्द भरी कहानी
सुनकर भक्तों छलक उठेंगे आंखों से पानी 

1----------

परशुराम से एक दिन बोले जमदग्नि मुनिवर 
मानोगे मेरी आज्ञा न होगा कोई प्रश्न उत्तर 
सुनकर न करना इंकार,  पिता का रखना मान 
होगा मेरा तिरस्कार ये बात तू रखना ध्यान 
खेलेगी किस्मत कैसा खेल,  न परशुराम ने जानी
हैं मां रेणुका ____________

2-----------

परशुराम बिन सोचें बोले, निभाऊंगा वचन 
पालन करके आज्ञा का,  होगा मन मेरा उपवन
मुनिवर बोले परशुराम, अपना शस्त्र उठाओ
अपनी तुम माता का शीश धड़ से अलग कर जाओ
पुत्र का हो गया हृदय घात, सुनकर पिता की वाणी 
है मां रेणुका ___________

3----------

यह सोचकर थर-थर कांपे, पुत्र परशुराम 
होगा कैसे काम अनर्थ, चरण है जिनके धाम
मन ही मन में बह रही, अश्रु की तेज धारा
इस विधि के विधान ने यह क्या लिख डाला 
वक्त के आगे हार गए,  बड़े बड़े महाज्ञानी 
है मां रेणुका ____________

4------------

जीवन बन गई एक पहेली, कैसे सुलझाऊं
मां के मैं प्राण बचाऊं,या दिया वचन निभाऊं
मुझको मां करना क्षमा,  हालात से मजबूर 
हो जाएगा घोर पाप क्या था मेरा कसूर
उठाया शस्त्र मां के प्रति,  पिता की आज्ञा मानी
हैं मां रेणुका परशुराम _____________

5--------------

परशुराम से मुनिवर बोले,  मैं हूँ अति प्रसन्न
क्षण भर भी देर न की, पूरा तुमने किया वचन 
पितृ भक्ति बड़ी महान्,  मांगो तुम वरदान 
सुनलो पिता करुण पुकार, दो मां को जीवनदान 
बस यही है विनती मेरी,  करदो मेहरबानी 
हैं मां रेणुका परशुराम ____________

6-------------

परशुराम मां रेणुका की,  दे ये सीख घटना 
विवाद मातृ पितृ का बिन जाने पक्षन तोलना
सोचें समझें न देना तुम कोई भी वचन 
बाद मे पछताओगे,  न लौटेगा वो क्षण 
गांठ बांध लो भक्तों ना करना कभी नादानी 
हैं मां रेणुका परशुराम-----------

गीतकार - कीर्ति पाहुजा 
स्थान - माँ रेणुका मन्दिर जमदारा भिण्ड मप्र .
सहयोग - शिवेन्द्र सिंग गुर्जर
संकलनकर्ता - रविन्द्र मानकर