आओ सुनाऊँ तुमको महिमा मां ताप्ती के नाम की ।
महिमा गजब निराली है इनके पावन धाम की ।
जय ताप्ती मैया...जय ताप्ती मैया...
प्रिय भक्तो पुण्य सलिला ताप्ती माँ जो युगों युगों और कल्पो -कल्पो से सूर्यदेव के बाहों मॆ अखिलिया करते हुये ऊँचे नीचे रास्तों से गुजरते हुये कही फूल खिलाती है..कही अन्न उगाती जन जन जीवन का संचार करती हुईं मूलतापी के गौ मुख से निकलकर पूरे देश का भ्रमण करती हुईं सूर्यपूर के अरबसागर मॆ विलीन हो जाती है । ताप्ती मैया की महिमा कितनी निराली है , भक्तो ये पापों को धोकर मुक्ति दिलाती है , मृत्यु सीमा पर पड़े मनुष्य के मुँह यदि
ताप्तीजल की दो बूँद डाल दी जाये या भूलवश भी ताप्ती जल मॆ मृत देह की अस्थि प्रवाहित हो जाती है तो उस मृत आत्मा को मुक्ति मिल जाती है ।
ताप्ती मैया सृष्टि आरम्भ से निरन्तर बहती चली आ रही है ।
ये कभी थकती है ना कभी विश्राम करती है , हम सब की झोली सुखों से भरती रहती है । ताप्ती कहाँ से आयी , कैसे आयी और कहाँ जाती है ,इस पतित पावनी ताप्ती मैया की कथा आपको सुनाती हूँ..।
1. सूर्य देव का हुआ विवाह ये बात है बड़ी पूरानी ।
विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा बनी सूर्य की रानी ।
सूर्यदेव संज्ञा के संग जीवन लगे बिताने ।
यम मनु और यमुना उनकी तीन हुई संताने ।
संज्ञा सूर्य के तेज को सह ना सकी ज्यादा ।
सूर्यदेव को छोड़ने का उसने किया इरादा ।
सूर्यदेव की सेवा में छोडा अपनी छाया को।
संज्ञा घोड़ी बनकर तप करने गई मन्दिर को ।
ना उसको डर था ना थी फिकर हर अंजाम की ।
आओ सुनाओ....
इधर सूर्यदेव भी अपने तेज से संसार को गति दे रहे थे, उनके प्रचण्ड तेज से पृथ्वी पर तापमान और गर्मी इतनी बढ़ गई कि धरती सूर्य के तेज से नष्ट हो रही है ,पृथ्वी के हिम झिलाखण्ड भी पिघलकर पीछे हट रहे थे । अत्यधिक गर्मी से पृथ्वी कि प्राण वायु पर असर पडने लगा जिसके कारण सभी जीव ब्रम्हा जी मॆ समाने लगे । सूर्य देव के तेज के कारण ब्रम्हा भी सॄष्टि कि पुन : निर्माण करने मॆ असफल रहे । तब सभी देव और माँ पृथ्वी शिव शंकर महादेव के पास जाकर प्रार्थना करने लगे । तब महादेव जी ने सभी से कहाँ..
2. छोड़ दो चिंता सारी अब तुम हो जाओ तैयार ।
सूर्यदेव की पुत्री ताप्ती अब लेंगी अवतार ।
ताप्ती मैया इस धरती का बढ़ता ताप हरेँगी ।
वो सबका कल्याण करेंगी सबके पाप हरेंगी ।
आंखों में उम्मीद लिए मन में लेकर आस ।
इतना सुन कर चले गए सब सूर्य देव के पास ।
सब देवो ने सूर्य देव के आगे सर को झुकाया ।
अब आपको रक्षा करना है सबके प्राणों की ।
आओ तुम्हे सुनाऊँ...
धरती पर बढ़ती गर्मी और तापमान को रोकने के लिये सभी देवों ने सूर्यदेव से प्रार्थना कि और धरती माँ ने कहाँ हे प्रभु अगर आपने सॄष्टि रक्षा के लिये ताप्ती माँ ध्यान नही किया तो सारी सॄष्टि का विनाश हो जायेंगा ।सबकी प्रार्थना सुनकर सूर्यदेव ने अपनी पुत्री का ताप्ती ध्यान किया -
3. सूर्य देव ने अपनी पुत्री को याद किया था जिस दिन ।
वो आषाढ़ का महीना सप्तमी का था दिन ।
सूर्य देव के ताप से प्रकट हुई मां ताप्ती शक्तिशाली ।
उनके तेज से चारों दिशाएं हो गई उजियाली ।
प्रथम नदी के रूप में ताप्ती धरती पे आई । ताप हरा मां ने धरती का खुशियां लौटाई ।
सूर्य ने अपने तेज से इनको प्रकट किया।
तब से ताप्ती मैया इनका नाम हुआ। लाज रख ली मैया ने सबके सम्मान की ।
आओ सुनाओ...
तब से हि ताप्ती माँ को आदिगंगा भी कहते है क्युकी वो हि सॄष्टि आरम्भ मॆ जल के रुप मॆ धरती पर आयी है । सभी नदियों उनका सेवन करती है , परन्तु उधर जब भगीरथ जी कि कठिन तपस्या से गंगा धरती पर नही आयी तब विष्णु जी ने पूछा कि हे देवी आप ब्रम्हा जी के कमन्डल से धरती पर क्यू नही जा रही हो , तो गंगा जी ने कहाँ
4. मां ताप्ती की महिमा इतनी सब उनको पुजेँगे ।
मैं जाऊंगी धरती पर मुझको नहीं पुजेँगे ।
विष्णु जी बोले नारद से तुम धरती पर जाओ ।
ताप्ती जी के पुराने सारे ग्रंथ चुरा ले आओ ।
ताप्ती ग्रंथ ना होने से उन्हें दुनिया नहीं जानेगी ।
धरती पर फिर सारी दुनिया गंगा तुम्हे नहीं मानेंगे ।
ताप्ती मां से झूठ बोलकर नारद ने ग्रंथ चुराए ।
गंगाजी तब आई धरा पर दुनिया महिमा गाए ।
तब से ही कम है धरती पर महिमा तापी नाम की ।
आओ सुनाओ तुमको...
तापी पुराण चोरी होने से माँ ताप्ती का प्रभाव तो कम नही हूआ पर लोग ताप्ती जी कि महिमा ज्यादा जान न पाये । ताप्ती माँ को नारद जी द्वारा धोके का पता चला तो उन्होने को कुष्ठ रोग का श्राप दिया और गंगा जी को अपने हि कुलवंश मॆ वधू बनकर आने का और उनकी वंश बेल ना बढ़ पाने का श्राप दिया ।श्राप से भटकने के बाद नारद मुनि ने मूलतापी आकर ताप्ती माँ कि 12 साल तपस्या की जब ताप्ती माँ प्रसन्न हुईं और उनके जल मॆ स्नान करके नारद जी श्राप मुक्त हुये । उधर गंगा मैया को भी शान्तनु से विवाह करके ताप्ती माँ की पौत्रवधू बनना स्वीकार करना पड़ा । आषाढ़ सप्तमी पर गंगा जी ताप्ती माँ के जल सेवन करती है । समुद्र मंथन से निकली मदिरा जो राक्षसों ने वरुण देव को दे दी थी और वरुण देव ने उस मदिरा का पान अगस्त मुनि के आसन पर किया जिसे देखकर अगस्त मुनि ने वरुण देव को मनुष्य योनि मॆ जन्म लेने का श्राप और पुत्र मुख देख मुक्ति का उपाय बताया । इन्ही का ताप्ती जी के साथ विवाह हूआ ।
5. वन में जब संवरण करने आये शिकार। वन में वो अपना दिल गये तब हार ।
जब तकराई ताप्ती से संवरण की नजर ।
मोहित हो गए ताप्ती को पल में देखकर ।
राजा ने फिर ताप्ती से अपनी कही कहानी ।
फिर बोले करके विवाह बन जाओ मेरी रानी ।
ताप्ती बोली मुझ को पाना है तो ऐसा करो ।
मै सूर्य पुत्री मेरे पिता को प्रसन्न करो । अदृश्य हुई ताप्ती करके बोल काम के। आओ सुनाओ सुनाओ..
इधर संवरण ताप्ती जी को पुकारते हुये बेहोश हो गये फिर जब वो होश मॆ आये तो उन्होने ने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये उनका तप शुरू किया । इधर सूर्यदेव ने संवरण के तप की परीक्षा ली ।एक बार रात को संवरण ध्यान मॆ मग्न थे. तब उनके कान मॆ आवाज लगाई कि हे राजन तू यहाँ किसका तप कर रहा है, उधर तेरी राजधानी आग से जल रही है , तेरा कुटुम्ब जल रहा है , तेरे नाम कि बदनामी हो रही है । परन्तु फ़िर राजा का तप नही टूटा ।संवरण कि दृढ़ता देख सूर्य नारायण प्रसन्न हुये और प्रकट होकर संवरण को वर माँगने को कहाँ फिर -
6. संवरण ने सूर्य देव को देखकर किया नमन ।
मांग रहे सूर्यदेव से वो अनमोल वचन ।
हे भगवन अपनी पुत्री को दे दो ये आजादी ।
सात फेरे लेकर ताप्ती कर ले मुझसे शादी ।
सूर्य देव बोले संवरण बात पता है सारी । गुरु वशिष्ठ के हाथों कराओ शादी की तैयारी ।
सबकी राजी मरजी से फिर पूरण काज हुये ।
संवरण और ताप्ती एक दूजे के हुए । फिर अपनी जिंदगानी एक दूजे के के नाम की ।
आओ सुनाओ
इसके बाद सभी देवों और ब्रम्हाणो ने संवरण और ताप्ती को आशीर्वाद दिया । शादी के कूछ अंतराल बाद ताप्ती जी ने एकपुत्र को जन्म दिया और अपने पुत्र का मुँह देखकर संवरण श्राप मुक्त हुये और अपने वरुण देव स्थान को प्राप्त हुये । ताप्ती जी ने अपने पुत्र का नाम कुरु रखा और राज बाग डोर अपने पुत्र के हवाले सौंप वो भी अपने स्थान चली गई । फिर जिस जगह ताप्ती जी के पुत्र गुरु ने तप किया था आगे चलकर वह कुरु
क्षेत्र धर्मक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ । राजा कुरु पांडवों और कौरवों के पितामह बने । राजा जनमेजय के सर्प विनाशी यज्ञ से धर्म हानि हुईं जिसका निवारण भी ताप्ती जी चरणों पर हुआ माँ ताप्ती सर्पों के निवेदन पर उन पर विराजमान हो गई ।
Production by Dharm Prachar Prasar Manch
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