गुरुवार, 28 नवंबर 2019

तुमसे लगन है लगाई - ताप्ती विदाई गीत शहनाज अख्तर


तुमसे लगन है लगाई
मेरी ताप्ती माई ,
बुलाओ तट पर मूझे

पलछिन पड़े ना राहिये
 मेरी ताप्ती माई

कर दों दया की नजरिया
माँ चुनरिया चढ़ाउंगी

तेरे किनारो मे अपनी
ये चुनरिया उमरिया बिभाउंगी

दूर धाम मुलताई
 मेरी ताप्ती माई
बुलाओ तट पर मूझे

तुमसे लगन है लगाई
मेरी ताप्ती माई
तुमसा ना कोई वरदानी
हे भवानी मेरी माँ

काहे की सुध बिसराई ,
मेरी ताप्ती माई
बुलाओ तट पर मूझे

करुणामयी हॊ भवानी ये
 जिन्दगानी सवारी हॊ ।
भुल जो हुई दों भवानी
महारानी बिसार दों

बेनाम भूरिया भर
आई मेरी ताप्ती माई
बुलाओ तट पर मूझे

माँ सूर्यपुत्री ताप्ती देवी की महिमा पर तैयार विदाई भजन गोविन्द बेनाम जी ने लिखा है और शहनाज अख्तर जी ने गाया है । वही एक भजन का निदेशन रविन्द्र मानकर ने किया है । 

माँ ताप्ती सम्पूर्ण गाथा - शहनाज अख्तर गायिका

आओ सुनाऊँ तुमको महिमा मां ताप्ती के नाम की  ।
महिमा गजब निराली है इनके पावन धाम की ।
जय ताप्ती मैया...जय ताप्ती मैया...




प्रिय भक्तो पुण्य सलिला ताप्ती माँ जो युगों युगों और  कल्पो -कल्पो से सूर्यदेव के बाहों मॆ अखिलिया करते हुये ऊँचे नीचे रास्तों से गुजरते हुये कही फूल खिलाती है..कही अन्न उगाती जन जन जीवन का संचार करती हुईं मूलतापी के गौ मुख से निकलकर पूरे देश का भ्रमण करती हुईं सूर्यपूर के अरबसागर मॆ विलीन हो जाती है । ताप्ती मैया की महिमा कितनी निराली है , भक्तो ये पापों को धोकर मुक्ति दिलाती है , मृत्यु सीमा पर पड़े मनुष्य के मुँह यदि
ताप्तीजल की दो बूँद डाल दी जाये या भूलवश भी ताप्ती जल मॆ मृत देह की अस्थि प्रवाहित हो जाती है तो उस मृत  आत्मा को मुक्ति मिल जाती है ।
ताप्ती मैया सृष्टि आरम्भ से निरन्तर बहती चली आ रही है ।
ये कभी थकती है ना कभी विश्राम करती है , हम सब की झोली सुखों से भरती रहती है । ताप्ती कहाँ से आयी  , कैसे आयी और कहाँ जाती है ,इस पतित पावनी ताप्ती मैया की कथा आपको सुनाती हूँ..।

1. सूर्य देव का हुआ विवाह  ये बात है बड़ी पूरानी  ।
विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा बनी सूर्य की रानी ।
सूर्यदेव संज्ञा के संग जीवन लगे बिताने ।
यम मनु और यमुना उनकी तीन  हुई  संताने ।
संज्ञा सूर्य के तेज को सह ना सकी ज्यादा ।
सूर्यदेव को छोड़ने का उसने किया इरादा ।
सूर्यदेव की सेवा में छोडा अपनी  छाया को।
संज्ञा घोड़ी बनकर तप  करने गई मन्दिर को ।
ना उसको डर था ना थी फिकर हर  अंजाम की ।
आओ सुनाओ....

इधर सूर्यदेव भी अपने तेज से संसार को गति दे रहे थे, उनके प्रचण्ड तेज से पृथ्वी पर तापमान और गर्मी इतनी बढ़ गई कि धरती सूर्य के तेज से नष्ट हो रही है ,पृथ्वी के हिम झिलाखण्ड भी पिघलकर पीछे हट रहे थे । अत्यधिक गर्मी से पृथ्वी कि प्राण वायु पर असर पडने लगा जिसके कारण सभी जीव ब्रम्हा जी मॆ समाने लगे । सूर्य देव के तेज के कारण ब्रम्हा भी सॄष्टि कि पुन : निर्माण करने मॆ असफल रहे । तब सभी देव और माँ पृथ्वी शिव शंकर महादेव के पास जाकर प्रार्थना करने लगे । तब महादेव जी ने सभी से कहाँ..

2. छोड़ दो चिंता सारी अब तुम हो जाओ तैयार ।
सूर्यदेव की पुत्री ताप्ती अब लेंगी अवतार ।
ताप्ती मैया इस धरती का बढ़ता ताप हरेँगी ।
वो सबका कल्याण करेंगी सबके पाप हरेंगी ।
आंखों में उम्मीद लिए मन में लेकर आस ।
इतना सुन कर चले गए सब सूर्य देव के पास ।
सब देवो ने सूर्य देव के आगे सर को झुकाया ।
अब आपको रक्षा करना है सबके प्राणों की ।
आओ तुम्हे सुनाऊँ...

धरती पर बढ़ती गर्मी और तापमान को रोकने के लिये सभी देवों ने सूर्यदेव से प्रार्थना कि और धरती माँ ने कहाँ हे प्रभु अगर आपने सॄष्टि रक्षा के लिये ताप्ती माँ ध्यान नही किया तो सारी सॄष्टि का विनाश हो जायेंगा ।सबकी प्रार्थना सुनकर सूर्यदेव ने अपनी पुत्री का ताप्ती ध्यान किया -

3. सूर्य देव ने अपनी पुत्री को याद किया था  जिस दिन ।
वो आषाढ़ का महीना सप्तमी का था दिन ।
सूर्य देव के ताप से प्रकट हुई मां ताप्ती शक्तिशाली ।
उनके तेज से चारों दिशाएं हो गई उजियाली ।
प्रथम नदी के रूप में ताप्ती धरती पे  आई । ताप हरा मां ने धरती का खुशियां लौटाई ।
सूर्य ने अपने तेज से इनको प्रकट किया।
तब से ताप्ती मैया इनका नाम हुआ। लाज रख ली मैया ने सबके सम्मान की ।
आओ सुनाओ...

तब से हि ताप्ती माँ को आदिगंगा भी कहते है क्युकी वो हि सॄष्टि आरम्भ मॆ जल के रुप मॆ धरती पर आयी है । सभी नदियों उनका सेवन करती है , परन्तु उधर जब भगीरथ जी कि कठिन तपस्या से गंगा धरती पर नही आयी तब विष्णु जी ने पूछा कि हे देवी आप ब्रम्हा जी के कमन्डल से धरती पर क्यू नही जा रही हो , तो गंगा जी ने कहाँ

4. मां ताप्ती की महिमा इतनी सब उनको पुजेँगे ।
मैं जाऊंगी धरती पर मुझको नहीं पुजेँगे ।
विष्णु जी बोले नारद से तुम धरती पर जाओ ।
ताप्ती जी के पुराने सारे ग्रंथ चुरा ले आओ ।
ताप्ती ग्रंथ ना होने से उन्हें दुनिया नहीं जानेगी ।
धरती पर फिर सारी दुनिया गंगा तुम्हे नहीं मानेंगे ।
ताप्ती मां से झूठ बोलकर नारद ने ग्रंथ चुराए ।
गंगाजी तब आई धरा पर दुनिया महिमा गाए ।
तब से ही कम है धरती पर महिमा तापी नाम की ।
आओ सुनाओ तुमको...

तापी पुराण चोरी होने से माँ ताप्ती का प्रभाव तो कम नही हूआ पर लोग ताप्ती जी कि महिमा ज्यादा जान न पाये । ताप्ती माँ को नारद जी द्वारा धोके का पता चला तो उन्होने को कुष्ठ रोग का श्राप दिया और गंगा जी को अपने हि कुलवंश मॆ वधू बनकर आने का और उनकी वंश बेल ना बढ़ पाने का श्राप दिया ।श्राप से भटकने के बाद नारद मुनि ने मूलतापी आकर ताप्ती माँ कि 12 साल तपस्या की जब ताप्ती माँ प्रसन्न हुईं और उनके जल मॆ स्नान करके नारद जी श्राप मुक्त हुये । उधर गंगा मैया को भी शान्तनु से विवाह करके ताप्ती माँ की पौत्रवधू बनना स्वीकार करना पड़ा । आषाढ़ सप्तमी पर गंगा जी ताप्ती माँ के जल सेवन करती है । समुद्र मंथन से निकली मदिरा जो राक्षसों ने वरुण देव को दे दी थी और वरुण देव ने उस मदिरा का पान अगस्त मुनि के आसन पर किया जिसे देखकर अगस्त मुनि ने वरुण देव को मनुष्य योनि मॆ जन्म लेने का श्राप और पुत्र मुख देख मुक्ति का उपाय बताया । इन्ही का ताप्ती जी के साथ विवाह हूआ ।

5. वन में जब संवरण करने आये शिकार। वन में वो अपना दिल गये तब हार ।
जब तकराई ताप्ती से संवरण की नजर ।
मोहित हो गए ताप्ती को पल में देखकर ।
राजा ने फिर ताप्ती से अपनी कही कहानी ।
फिर बोले करके विवाह बन जाओ मेरी रानी ।
ताप्ती बोली मुझ को पाना है तो ऐसा करो ।
मै सूर्य पुत्री मेरे पिता को प्रसन्न करो । अदृश्य हुई ताप्ती करके बोल काम के। आओ सुनाओ सुनाओ..

इधर संवरण ताप्ती जी को पुकारते हुये बेहोश हो गये फिर जब वो होश मॆ आये तो उन्होने ने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये उनका तप शुरू किया । इधर सूर्यदेव ने संवरण के तप की परीक्षा ली ।एक बार रात को संवरण ध्यान मॆ मग्न थे. तब उनके कान मॆ आवाज लगाई कि हे राजन तू यहाँ किसका तप कर रहा है, उधर तेरी राजधानी आग से जल रही है , तेरा कुटुम्ब जल रहा है , तेरे नाम कि बदनामी हो रही है । परन्तु फ़िर राजा का तप नही टूटा ।संवरण कि दृढ़ता देख सूर्य नारायण प्रसन्न हुये और प्रकट होकर संवरण को वर माँगने को कहाँ फिर -

6. संवरण ने सूर्य देव को देखकर किया नमन ।
मांग रहे सूर्यदेव से वो अनमोल वचन ।
हे भगवन अपनी पुत्री को दे दो ये  आजादी ।
सात फेरे लेकर ताप्ती कर ले मुझसे  शादी ।
सूर्य देव बोले संवरण बात पता है सारी । गुरु वशिष्ठ के हाथों कराओ शादी की तैयारी ।
सबकी राजी मरजी से फिर पूरण काज हुये ।
संवरण और ताप्ती एक दूजे के हुए । फिर अपनी जिंदगानी एक दूजे के के नाम की ।
आओ सुनाओ

इसके बाद सभी देवों और ब्रम्हाणो ने संवरण और ताप्ती को आशीर्वाद दिया । शादी के कूछ अंतराल बाद ताप्ती जी ने एकपुत्र को जन्म दिया और अपने पुत्र का मुँह देखकर संवरण श्राप मुक्त हुये और अपने वरुण देव स्थान को प्राप्त हुये । ताप्ती जी ने अपने पुत्र का नाम कुरु रखा और राज बाग डोर अपने पुत्र के हवाले सौंप वो भी अपने स्थान चली गई । फिर जिस जगह ताप्ती जी के पुत्र गुरु ने तप किया था आगे चलकर वह कुरु
क्षेत्र धर्मक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ । राजा कुरु पांडवों और कौरवों के पितामह बने । राजा जनमेजय के सर्प विनाशी यज्ञ से धर्म हानि हुईं जिसका निवारण भी ताप्ती जी चरणों पर हुआ माँ ताप्ती सर्पों के निवेदन पर उन पर विराजमान हो गई ।

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बुधवार, 27 नवंबर 2019

माँ ताप्ती की सम्पूर्ण महिमा : इक्कीस कल्प के इक्कीस तीरथ - भजन गायिका शहनाज अख्तर

ताप्ती माँ  के धाम के......
इक्कीस कल्प के इक्कीस तीरथ सब की खास बात
इक्कीस तीरथ क्यों है जरूरी सुनो सुनाओ बात.....
दीवानों आओ मेरे साथ
भक्तो आओ मेरे साथ
1.  सूर्यलोक पहला तीरथ ताप्ती माँ जन्मी थी ।
पहली नदी के रूप में धरती पर आई थी ।
मुलतापी तीर्थ दूजा सुन लो मेरे भाई ।
ताप्ती माँ यहीं धरा पर जल के रूप में आई ।

इसी मुलतापी तीर्थ में साथ कुंड है ....
( सूर्य..शनि..ताप्ती..धर्म कुंड..पाप..नारद .नागा )

हर एक कुंड की है यहां रही है अपनी खास बात ।
दीवानों आओ मेरे साथ......
2.   शांडिल्य मुनि ने ताप्ती तट पर जप-तप खूब किया ।
इसलिए ये तीसरा तीरथ शांडिल्य तीर्थ हुआ ।
चौथा तीर्थ श्रवण तीरथ बनकर हुआ साकार ।
माता पिता संग आए थे यहां श्रवण कुमार ।
सुन लो सारे तीरथ के क्या-क्या करामात
दीवानों आओ मेरे साथ.....

3. पारसढोह तीर्थ पाँचवा  ऐसी यहां की शक्ति ।
कपिला छट गऊ दान से मिलती यहाँ मुक्ति ।
सूर्यमुखी तीरथ पर ताप्ती उलटी दिशा में बहती ।
इस तीरथ पर श्राप से मिल जाती है मुक्ति ।
कर लो बस स्नान जब आए मकर संक्रांत।
दीवानों आओ मेरे साथ....

4.सातवा तीरथ पावन है बारहलिंग शिव धाम ।
अपने पिता की श्राप मुक्ति यहां करें श्री राम ।
कान्हा ने जब देह त्यागी  क्रोधित हुए दुर्वासा ।
यहीं से स्वर्ग सिधारे जब खत्म हुई हर आशा ।
देवलोक के स्वर्ग का एक ही रस्ता देवल घाट ।
दीवानों आओ मेरे साथ

5.ब्रम्हा के आदेश पे मोहनी भंग करे एक तप ।
पूछ रही वो शिव शंकर से क्या करूं मैं अब ।
बोले भगवन ताप्ती माँ के जल में तुम समाओ ।
मोहिनी ताप्ती संगम बनकर यहां से मुक्ति पाओ।
छ :महीने यहां स्नान करें जो सिद्ध हो हर काज ।
दीवानों आओ मेरे साथ...

6. दसवा तीर्थ स्थालेेश्वर इसीलिये  कहे ।
गय्या बनके यहाँ पे यमुना ताप्ती प्रवेश करे ॥
इच्छापूरी तीरथ पे इच्छा पूरी होती सारी ।
तप करे  एक ब्राह्मण हो प्रसन्न माँ अवतारी ।
देवी ने ब्राह्मण के मन की पूरी कर दी बात ।
दीवानों आओ मेरे साथ........

7. ताप्ती पूर्णा संगम देखो बारवा तीरथ कहांए ।
यहां श्री विष्णु आदिवराह रूप में थे आए ।
सारंगखेडा तीरथ यहां इंद्र देवता आये ।
यहां से एक सुरंग से होकर वो पाताल जाएं
कर लो यहां स्नान रहता सात जनम तक  राज
दीवानों आओ मेरे साथ....

8.  चक्रतीर्थ में कृष्ण जी ने करंक दैत्य को मारा ।
इस तीरथ से होकर दैत्य स्वर्ग को सिधारा ।
प्रकाशा तीरथ पापनाशक जल इसका मतवाला ।
जो भी  करे स्नान  उसके जीवन में हो उजाला।
ब्रह्माजी यहां स्नान करें गजब इसकी बात
दीवाना आओ मेरे साथ..........

9. श्री गणेश कार्तिकेय को बाला तीरथ समझाए
ताप्ती शरण में आए कार्तिक मात- पिता को पाएँ
गौतम ऋषि की विनती से  ताप्ती मां यहाँ आई ।
रहने लगी फिर मां यही पे तीर्थ है फलदाई ।
ऐसा है तीरथ गोतमेश्वर यहां  नवाऊं माथ ।
दीवाना आओ  मेरे साथ.....

10. भैरवी तीर्थ पर इंद्र पुत्र ने श्राप से मुक्ति पाएं ।
भैरवी देवी की स्तुति उसने यहां जब गाई ।
सूर्य देव का तेज हुआ कम  होने लगे बेचैन ।
ताप्ती समुद्र संगम तीर्थ से मिला उन्हें चैन ।
ताप्ती जी के जल में नहाकर मिटा इंद्र संताप
दीवाना आओ मेरे साथ...
11. कुरुक्षेत्र मॆ  हुआ ताप्ती मां का स्वयंवर।
ताप्ती मां ने पुत्र कुरु को दिया यहां कीर्तिवर ।
ताप्ती झिरी में मां ताप्ती करती सदा ही वास ।
याद करे जो यहां पर मां को हो जाता है एहसास।
योगी संत को मछली रूप में दर्शन दिया साक्षात ।

दीवाना आओ मेरे साथ...
भक्तो आओ मेरे साथ...
इक्कीस कल्प के इक्कीस तीरथ सबकी खास बात
इक्कीस तीरथ क्यों है ज़रूरी सुनो सुनाऊँ बात

सम्पूर्ण ताप्ती माहात्म्य का संकलन श्री रविन्द्र मानकर जी ने किया जिसके आधार पर देवास के गीतकार जयंत सांखला जी ने माँ ताप्ती जी के इक्कीस कल्प तीर्थों की भजनावली तैयार की । ताप्ती महिमा का रिकॉर्डिग जबलपुर के एन वी आर स्टूडियो मे नरेन्द्र रंजक जी के सानिध्य मे हुई । ताप्ती इक्कीस कल्प तीर्थ भजन कों शहनाज अख्तर जी ने गाया है वही इसे दिनेश खड़ेतिया ने संगीत दिया ।
धर्म प्रचार प्रसार मंच संगठन ने इसका निर्माण किया ।
नीचे वीडियो युटुब चैनल का लिंक दिया है
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